शिक्षक अपने बच्चों को उसी स्कूल में पढ़ाएँ जहाँ वे कार्यरत हैं - एक विचार
कुछ दिन पूर्व मेरे एक प्रिय मित्र ने मुझे कहा कि शिक्षक की भूमिका वर्तमान परिपेक्ष मे कैसी होनी चाहिए ?
इसी संदर्भ में मेरे दिमाग में यह विचार आया कि शिक्षक ही एक बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है। जरूरत है, तो शिक्षकों को अपने आप के महत्व को समझने की और बदलाव का एक आवश्यक घटक बनने की। प्रातः काल जब हजारों विद्यार्थी विद्यालय प्रांगण में प्रार्थना कर रहे होते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात सरस्वती मां अपना आशीर्वाद सबको दे रही हो।सब लोग पवित्रता की हद तक अपने आप को आध्यात्मिक महसूस करते हैं। वहां पर ना कोई धर्म, ना कोई जात, ना कोई रंग, सब एक रंग में रंगे होते हैं विद्या की देवी सरस्वती की आराधना में।
हिंदुस्तान जैसे देश में जहाँ पर हर घर से विद्यार्थी विद्यालय रूपी मंदिर में आते हैं और एक जैसी शिक्षा प्राप्त करते हैं वहां पर जब रिजल्ट धार्मिक कट्टरता के नाम पर हिंसा और अलगाववाद दिखने में आता है तो निश्चित रूप से शिक्षकों की भूमिका पर विचार की आवश्यकता है।आज जब अधिक से अधिक संख्या में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिल रहा है तो जिस तरह की बातें समाज में चल रही है वह एक चिंतनीय विषय है । पाठ्यक्रम चाहे कैसा भी हो पाठ्यक्रम का स्वरूप चाहे किसी भी काल को इंगित करता हो, उद्देश्य तो सबका मानव हित ही होना चाहिए। एक बात हमें समझनी होगी कि हम लोगों ने विकास का चरमोत्कर्ष देख लिया है, लोग अपनी जमीन छोड़कर देश विदेश में बसने के बाद अपनी जड़ों को वापस लौटने को आतुर हैं। शिक्षा पर लोगों को विश्वास उठने लगा है ।सरकारी संस्थानों में आस्था नहीं रही। चंद लोगों के धर्मांध होने के कारण और राजनीतिक परिदृश्य से जो परिभाषा गढ़ी जा रही है वह मानवता के पूर्णतया खिलाफ है। ऐसे समय में एक उम्मीद की किरण नजर आती है वह है शिक्षक, अब समय है शिक्षक शिक्षा को एक नये दृष्टिकोण से देखें और विद्यालयों में आने वाले बच्चों को उस फसल के तौर पर देखें जो आने वाली नस्लों के लिए सर्वोत्तम हो ।उसके लिए सर्वप्रथम अपना आचार विचार और अपना ज्ञान सर्वोत्कृष्ट परिभाषित होना चाहिए। समझना होगा धन दौलत चाहे किसी के पास कितनी ही आ जाए जब तक परिवार में प्रेम ,विश्वास और शांति नहीं है तो दुनिया की सारी धन दौलत का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अर्थात, व्यक्ति कितनी भी ऊंची उड़ान ले ले उसे अपने पंखो की छाया अपने प्रिय जनो तक ही पहुंचानी पड़ती है अन्यथा उस सफलता का कोई मोल नहीं रहता। हमें समझना होगा कि हम चाहे कितनी ही भौतिक संपदा इकट्ठे कर ले अगर हमारे बच्चों के आंखों में हमारे लिए वह प्रेम श्रद्धा भाव नहीं है तो फिर हमारा जीवन व्यर्थ है।
इसलिए, शिक्षक अपने बच्चों को अगर अपनी छत्रछाया में अपने ही कम संसाधनों में खुशी पूर्वक समय व्यतीत करें और एक नये आदर्श प्रस्तुत करें ,तो मुझे लगता है वह दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में देखें तो शिक्षक अपने बच्चों को अपने साथ नहीं रखना चाहते अब इसका यह तर्क बिल्कुल भी नहीं है कि वहाँ पर सुविधाएं नहीं है ।आज से 50 साल पहले भी सुविधाएँ नहीं थी लेकिन हम अपने माता-पिता के साथ उन्हीं विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करते हुए प्रसन्नता पूर्वक जीवन के सपने बुनते थे। आज ऐसा क्यों नहीं हो सकता ? विचार करना होगा !
अगर अपने विद्यालय में शिक्षक अपने बच्चों को पढ़ाएँ तो आवश्यक रूप से पढ़ाई की गुणवत्ता में फर्क पड़ेगा। गाँव के और लोग भी प्रोत्साहित होंगे और धीरे-धीरे सारा सिस्टम ट्रैक पर आता हुआ प्रतीत होगा। मैं उम्मीद करती हूँ मेरा लेख मेरे शिक्षक साथियों को पसंद आएगा। मैं ऐसे अनेकों उदाहरण आपके सामने प्रस्तुत कर सकती हूँ जिसमें बच्चों को सैकड़ों मील दूर हॉस्टल में या रिश्तेदारों के बीच रखकर उनका भविष्य बर्बाद होते हुए देखा है। साथ ही साथ जब बच्चा आपके साथ आपके सुख दुख में आपके कठिनाई में सहभागी बनता है तो उसका अनुभव बच्चे को जीवन पर्यंत याद रहेगा और वह आपके लिए एक अलग ही आदर भाव स्थापित करेगा। शिक्षक धार्मिक कट्टरता को एक आदर्श रूप में प्रस्तुत करें अपने धर्म के मूल में मानव हित को सर्वोपरि समझे। अगर किसी भी धर्म की धार्मिक कट्टरता बच्चों के मन में घर करती है और वह समाज में मार काट या हिंसा को जन्म देती है तो इस प्रकार के धार्मिक कट्टरता किसी भी प्रकार से स्वीकार्य ना हो ।लोग अपने आप को धार्मिक माने लेकिन जिसका अंजाम ही बर्बादी हो ऐसे धर्म को अस्वीकार करने में ही फायदा है। जो बच्चा अपने माता-पिता के दिव्य संस्कारों को और समाज के हित को जीवन में प्राथमिकता ना दे उसका जीवन ही व्यर्थ है जिस धरती ने हमें जन्म दिया, हमें सींचा, जहां पर हमारे पूर्वजों ने हमारे सुनहरे भविष्य के लिए प्रार्थनाएं की अगर हमें उस धरती से ही प्रेम नहीं रहा। शिक्षक की बच्चों में अहिंसा का बीज बो सकते हैं। महान लोगों की जीवनी को दैनिक जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। बच्चों को बता सकते हैं कि आँख के बदले आँख की अवधारणा दुनिया को अंधा बना देगी और जीवन को अंधकारमय।
- विभा पोखरियाल नौडियाल
(नोट:लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)
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